Tuesday, 15 April 2014

अर्चना

अर्चना किस देवता की
वह कि  जो पाषाण और निष्प्राण
बैठा मंदिरों की गोद में
जिसको नहीं अनुभूति कोई
देहरी पर सर पटककर लौट आईं
व्यथित आकुल और निराश्रित प्रार्थनाएँ
एक भी हँसता हुआ पाटल किसी की कामना को
दे नहीं पाया
मानवों की भीरुता जिसका सहारा
रमा कण -कण में जगत के
कथ्य में अभिव्यंजना जिसकी
जो विचारों में मुखर है
आस्था की पालकी में चिर विराजित
भावना के पुष्प केवल चाहता है !
किन्तु यह सौंदर्य मंडित गात किसकी अर्चना है ?
सचल आद्रिल प्राण वाली भव्य प्रतिमा
श्वास में जिसके अगोचर लोक
युग भुजाएं हार मूँगे के
नेत्रों के प्रखर आशा दीप
प्रीति के दोहे सरीखे होठ
श्वास गंधित धूप चन्दन युक्त
अर्चना का यह विशद ऐश्वर्य
कौन है वह भाग्यशाली देव ?
कौन है वह देवगृह ?
जो यह समर्पण कर वरण हो जाएगा कृतकृत्य
कामना नृत्य होगा किस निलय में ?
अर्चना के पुष्प जो धारण करेगा
वह कोई इंसान होगा
और वह इंसान तुम हो !
वह क्षण


वह क्रमिक सौंदर्य का उत्सर्ग
आ गया जब स्वर्ग धरती पर
प्रथम तो झुकते हुए दो नैन देखते यूँ कनखियों से
लाज ज्यों उन्माद के भुजपाश में हो
चाहती हो मुक्ति पर उन्माद का कहना न टाले
एक गहरी मदिर सी मुस्कान अधरों पर
कि जैसे बस गयी हो तुम
मेरी उद्यान वाली झोपड़ी में सहम करके
इस तरह देखा तुम्हें मैंने
कि जैसे हथकड़ी पहने कोई तैराक देखे
बाढ़ वाली सिंधु सी विस्तृत नदी को
हो गया क्षण एक में पक्षी हमारा मन
उड़े फिर - फिर तुम्हें छूता चहकता निस्सीम नभ में
ज्यों उड़े पछुआ हवा के गर्म झोंकों में
सितारों से जड़ी फर -फर तुम्हारी चूनरी
बन गयीं सौंदर्य का प्रतिमान तुम !
कामना का कोई शिल्पी
वासना की छेनियों से
कर रहा हो कल्पना अनुरूप
मन के चक्षुओं में
एक पत्थर को सुघर प्रतिमा बनाने की क्रिया
छत रही वह मूर्ति उतना बढ़ रहा सौंदर्य
वह क्षणिक निर्माण भी कितना बड़ा था
एक पल पीछे
तुहारी सहज आकृति
स्वर्ग के सौंदर्य से सुन्दर हुई !
और जब तुमने उठाये नैन
कुछ नशीले कुछ लजीले कुछ गुलाबी
अप्रकाशित वह अनूठा काव्य
जिसका प्रथम पाठक
छंद से नव छंद फिर अध्याय से अध्याय
पढ़ रहा अनुक्षण स्वयं में खो रहा था !
प्रिय तुम्हारे कर्णफूलों से
धरा पर हैं चमकते स्वप्न कुछ
वक्ष पर स्कंध से उतरे हुए कछ केश
उनकी भांति ही अस्थिर हमारी दृष्टि !
सोचता हूँ तुम अगर बिंदी लगातीं
बहुत अंन्याय होता
क्योंकि उस स्थान का स्पर्श
दो कोमल गुलाबी पंखुरी करतीं चहककर
और खुद निर्माण हो जाता
लजीली बिंदियों का !
यह कपोलों पर ढरक आईं लकीरें
ज्यों किसी छवि पटलिका पर
नापते सौंदर्य मन्मथ ने निसान लगा दिए हों !
तुम न बोलीं मैं न बोला एक क्षण बस
और फिर तुम दूर कोसों दूर
हाथ में सिंदूर लेकर मैं खड़ा
लोग कहते हैं समय फिर लौटता है
लौट आये फिर कहीं शायद पुराना क्षण !  
प्रेम दिवस पर

शायद तुम्हें बुरा लगा हो
एक गुलाब का फूल भी नहीं दे सका
प्रेम - दिवस पर
मेरा मौन - मौन रहना
मैं तुम्हें बहुत - बहुत प्यार करता हूँ
नहीं कह पाया मेरा संकोच
टूट गई तुम्हारी प्रतीक्षा
बहुत खला होगा मेरा व्यवहार
कुछ और दरक गया हो!
तुम्हारी सौगंध
मेरा कुछ भी नहीं है मेरे पास
वह मन भी नहीं
जो बहुत चाहता है तुम्हें
मेरा अहंकार भी नहीं
जो पुरुषोचित था
तुमसे अलग सोचने वाली सोच
कुछ भी बचा नहीं मेरे पास !
एकाकार हो चुकी है दो दीपकों की लौ
एक और एक मिलकर एक हो चुके हम
इस हाल में
क्या कहता तुमसे ? किसे देता गुलाब ?
तुम्हें सौंप चुका हूँ
कभी न मुरझाने वाला गुलाब
देखो नाराज़ मत होना
तुम्हारे रूठने या टूटने से
टूट जाएंगे हम !
        
प्रतिबिम्ब

तनिक अनुभूति से दो - चार हो लो
उतारो
औपचारिकता सने झूठे मुखौटे
तुम्हारे सामने
कदभर तुम्हारे
उघारो ज़रा सी पलकें
विलोको
प्रीति का दर्पण खड़ा है
सत्य से आँखें मिलाकर
स्वयं को मथकर
बात करने का नहीं अभ्यास तुमको
क्षम्य है
पर यह मुखौटा तो उतारो
बात करलो स्वयं से भी एक क्षण
मीत यह दर्पण तुम्हें
स्वीकार कर लेगा किसी भी रूप में
स्वयं का प्रतिबिम्ब देखो तो !
विवशता

बहुत लंबी प्रतीक्षा
किस लिए ? किसकी ?
करेगा कौन इस क्षण की समीक्षा
तुम्हें मालूम भी है यह प्रतीक्षा
कोई परिणाम है वश में किसी के
फूल का खिलना
किसी आश्चर्य का मिलना
ये कोई और ही है
हाथ में जिसके सभी कुछ
प्रकट होता है कभी प्रत्यक्ष
यह भ्रमों की यात्रा अनुक्षण
तिरोहित कर रही है
सुखद आशा के कंगूरे
चुभ गए कांटे
भावना के सुघर पांवों में
शून्यता का दृष्टि में आतंक
धड़कनों में भर गया नीला धुंआ
व्यर्थ ही कुंठा न पालो
विवशता यह तुम्हारी है रची तुमने
पसारो स्नेह का आँचल मिला जो भी
संभालो !


रूपसि

प्रेयसि ! तुम्हें क्यों लग रहा
कि तुम सुन्दर नहीं हो
तुम्हारी स्थूल काया
तुम्हारा सांवला रंग
तुम्हारी चाहतों के मार्ग में बाधा
बैरी हैं तुम्हारे स्वप्न के
तुम्हे शायद नहीं मालूम
दर्पण हो गई हो
प्यार की अभिनव परीक्षा ले रहा
एक भी तो रूप का लोभी
प्रेम का छलिया रसिक अलि
पास तक आया नहीं अब तक तुम्हारे
स्वार्थ की परतें चढ़ाये
वासना का क्षणिक पाठक
और यदि आ भी गया तो
जान लोगी एक क्षण में
करेगा जो प्यार तुमको
वह ह्रदय से ही करेगा
क्योंकि तुममे वह सभी कुछ है
जो नहीं होता सभी में
तुम्हें क्यों लग रहा रूपसि
कि तुम सुन्दर नहीं हो !



आयु

बात बेबात हंसना खिलखिलाना
घूमना भौतिक विचारों में
तुम्हारी आयु पर क्या यह गणित
उपयुक्त होगा
अभी तुम हो बहुत छोटी
कहाँ तुमने छुई हैं उम्र की ऊंचाइयां
छुई  - मुई
जहां अभिव्यक्ति देता है ह्रदय
शब्दों के प्रयास से बहुत ज़्यादा
गीत /बांसुरी /श्वास सारे ही
उतरकर भावना को शक्ति देते हैं
स्निग्ध भोलापन तुम्हारा
हरसिँगारी हँसी से अब भी जुड़ा है
उड़ा है प्रीति  के निस्सीम नभ में
तुम्हारी आस का नन्हा अबाबील
इसकी थकान को सम्बल देना
गति करना विरामहीन
केवल इस लिए बस
एक छोटी उम्र हो तुम
उम्र ही नहीं कुछ और प्रतीकों से आगे
और बढ़ना है तुम्हें
यह विश्व ही काफी नहीं है
किसी के दर्द का इतिहास पढ़ना है !